Monday, September 10, 2012

निजीकरण की ओर बढ़ता भारत का कोयला उद्योग

भारतीय कोयला उद्योग के निजीकरण के लिए तमाम विसातें बिछाई जा चुकी हैं। एक लंबे अरसे से इस दिशा में कोशिशें की जा रही थीं। अब लगता है कि आर्थिक नीतियों के मामले में प्रकारांतर से समान राय रखने वाले देश के प्रमुख राजनीतिक दलों को इसमें कामयाबी मिल चुकी है। देश के प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने-अपने तरीकों से ऐसी व्यवस्था कर दी है कि अब देश में कोयला उद्योग के निजीकरण की रफ्तार सरपट दौड़ने लगेगी। इसके लिए बड़ी चालाकी से देश की जनता के गले यह बात उतार दी गई कि नीलामी के रास्ते ही सही, कोयला खानें निजी हाथों में सौंपा जाना राष्ट्रहित में है। इसके पहले दो दशकों के दौरान दो काम किए गए थे। पहला यह कि कोल इंडिया लिमिटेड और उसकी अनुषँगी इकाइयों को पंगु बनाकर यह स्थापित किया गया कि सार्वजनिक क्षेत्र की कोयला कंपनियां कोयले के मामले में देश की जरूरतें पूरी करने में सक्षम नहीं हैं। लिहाजा विदेशी कोयले से भारतीयत उद्योगों की जरूरतें पूरी करने की मजबूरी है। बाद में कोयले के मामले में विदेशी निर्भरता कम करने की आड़ में कैप्टिव उपयोग के लिए कोयला खानें देशी उद्योगों को देने की नीति बनाई गई। ...और धीरे से इस नीति को और लचीला बनाकर अनेक मामलों में इस नीति की भी अनदेखी करके चहेती कंपनियों को उपकृत कर दिया गया। यह दीगर है कि इस तरह रेवड़ियां बांट देने से कोयले के आयात में कोई कमी नहीं आई है। यह बात कभी मुद्दा बनती, उसके पहले ही सरकार ने 29 बिजली संयंत्रों के साथ कोयला आपूर्ति के लिए इंधन आपूर्त्ति करार (एफएसए) करके एक और चाल चल दी। वह यह कि विद्युत संयंत्रों को उनकी कुल जरूरतों की 65-80 फीसदी तक कोयले की आपूर्ति कोल इंडिया लिमिटेड करेगा। इस समझौते में एक महत्वपूर्ण बात जोड़ी गई कि जरूरत पड़ने पर कोल इंडिया लिमिटेड कोयले का आयात करके भी करार के अनुरूप बिजली संयंत्रों की मांगें पूरी करेगा। इतना ही नहीं। करार में एक बात और जोड़ी गई कि कोल इंडिया लि. ने बिजली संयंत्रों की जरूरतें पूरी नहीं की तो दंड का भीगीदार भी होगा। बात सुनने में कितनी अच्छी लगती है। लगे भी क्यों नहीं। देश में कोयला आधारित 80 बिजली संयंत्र होने के बावजूद बिजली संकट गंभीर है। ग्रिड तक फेल कर जा रहा है। सर्वत्र यही रोना है कि कोयले की कमी विद्युत उत्पादन में बाधक बन रही है। जाहिर है कि इस बाधा को दूर करने के लिए सरकार का कोई भी कदम जनता को भाएगा ही। लिहाजा एक तरफ कोयले का आयात बड़े पैमान पर किया जा रहा है और दूसरी तरफ कोयला खदानों का आवंटन भी किया जाता रहा है। सरकार ने बड़े गर्व से अपने अनुमान को प्रचारित भी किया कि सन् 2017 में 194 मिलियन टन कोयले का आयात करना होगा। इन सवालों पर चर्चा तक बंद कर दी गई कि हम कोल वाशरियों का निर्माण के मामले में लापरवाह क्यों बने हुए हैं? जब हम कोल इंडिया विदेश बनाकर विदेशों में कोयला खनन की संभावना तलाश रहे हैं तो अपने देश में नई खानें विकसित क्यों नहीं कर रहे? मौजूदा कोयला खदानों का उसकी क्षमता के अनुरूप दोहन क्यों नहीं कर रहे? ऐसा क्यों होता है कि सीएमपीडीआई, जो कोल इंडिया लि. की ही अनुषंगी इकाई है, द्वारा कोयला खनन के लिए निर्धारित लक्ष्यों इतर कम लक्ष्य निर्धारित करके तथा अपने द्वारा तय मुकाम को हासिल करके अपन पीठ खुद थपथपा लेते हैं और निजी कंपनियों को आवंटित कोयला खानों से कोयले का उत्पादन क्यों नहीं हो रहा है? पक्ष-विपक्ष किसी तरफ इस बात को गंभीर नहीं माना गया कि बीते केवल छह सालों में कोयले का आयात कुल जरूरतों का 6 फीसदी से बढ़कर 13 फीसदी हो गया है। गंभीर बात यह है कि अब विद्युत संयंत्रों को यह निर्देश है कि उन्हें देश के अपेक्षाकृत घटिया कोयले में आयातित बेहतर कोयले की कम से कम 20 फीसदी मात्रा मिलानी होगी। ताकि प्रदूषण नियंत्रण में रहे। क्या इस व्यवस्था में साजिश की बूं नहीं आ रही? यदि अपने देश में पर्याप्त कोल वाशरियां होतीं तो क्या विदेश की कथित बेहत कोयले की मिलावट की बाध्यता होती? सन् 1971 से 1973 के बीच हुए कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद लगातार राष्ट्रीयकृत कोयला उद्योग को सरकारी स्तर पर कमजोर किया जाता रहा तो उद्योग जगत यह साबित करने में लगा रहा कि कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण का मकसद पूरा नहीं हो पाया। लेकिन कैप्टिव उपयोग के लिए कोयला ब्लाकों की नीलामी पर एक माहौल बनाकर सार्वजनिक क्षेत्र के कोयला उद्योग के निजीकरण का रास्ता खोल दिया गया है। दरअसल सन् 2000 में भाजपा की अगुआई वाली केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार ने कोयला राष्ट्रीयकरण संशोधन विधेयक 2000 संसद में पेश किया था। लेकिन यह पारित नहीं हो सका। देश भर की ट्रेड यूनियनों ने कोयला उद्योग के निजीकरण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और इस तरह मामला अटक गया था। कोल माइंस रेगुलेशन एक्ट 1857 की मूल भावनाओं के विपरित यह व्यवस्था दी गई है कि जो ऊंची बोली लगाएगा उसे ही कोयला ब्लाक मिलेगा। मतलब साफ है कि कोई भी उद्योगपति अपने उद्योग की स्थापना के लिए पूंजीनिवेश की बात तभी सोच पाएगा जब वह बोली के आधार पर कोयला ब्लाक लेने में कामयाब हो जाएगा। वरना उद्योग लगाने के बाद कोई कंपनी बोली के आधार पर कोयला खदान लेने में कामयाब नहीं हो पाया तो उसका तो बैंड बज जाएगा। ये दोनों ही स्थितियां औद्योगीकरण के मार्ग में बाधक बन सकती हैं। होना यह चाहिए था कि सरकार कोयला ब्लाकों के रिजर्व, कोयले के बाजार भाव और मुद्रा स्फीति को ध्यान में रखकर कोयला ब्लाकों का रिजर्व प्राइस तय करती। या फिर जिन कंपनियों को कोयला ब्लाक दिए जा चुके हैं, सरकार उनसे कहती कि वे सरकार द्वारा निर्धारित दर पर ही बिजली बेच सकती हैं। लेकिन कथित उदारीकरण की पक्षधऱ सरकार ने ऐसा करने के बदले बिजली की दर नियंत्रित किए बिना औने-पौने दाम पर खदानों का आवंटन चहेती कंपनियों को कर दिया। दूसरी तरफ अनेक जरूरतमंद कंपनियों को कोयला आयात के लिए मजबूर भी किया जा रहा है। सन् 2004-05 में कुल 20 मिलियन टन कोयले का आयात किया गया था। बीते वित्तीय वर्ष में यह आंकड़ा बढ़कर 84 मिलियन टन पहुंच चुका है। देश में जितने भी विधेयक बनाए जाते हैं, उन पर संसद की स्थाई समिति में चर्चा होती है। स्थाई समिति में सभी पार्टियों के सांसद होते हैं। जाहिर है कि सबकी सहमति के बिना कोई विधेयक अनुमोदित नहीं हो सकता। कुछ मामलों में कुछ सांसद असहमति जताते हैं तो यह रिकार्ड में होता है। कोयला ब्लाकों के आवंटन के मामले में अपनाई गईं नीतियों का उचित फोरम में प्रमुख राजनीतिक दलों ने विरोध किया, ऐसा देखने को नहीं मिला। यह नीतियों में समानता का ही द्योतक है। ऐसा प्रतीत होता है कि देश के बड़े औद्योगिक घराने चाहते हैं कि कोयला ब्लाकों की नीलामी हो। इसकी वजह यह है कि नीलामी के खेल में छोटे उद्योगपति ऐसे ही बाहर हो जाएगें। दूसरी बात यह है कि सरकार को वास्तविक चुनौतियां बड़े औद्योगिक घराने ही दे पाएँगे, जिससे नीति निर्धारकों को औद्योगिक घरानों के अनुरूप नीति बनाने में मदद मिलेगी। इसलिए न तो बड़े औद्योगिक घराने और न ही सरकार या विपक्ष कोयला ब्लाकों की कीमतें बाजार दर से तय करने के पक्ष में हैं। इन तमाम तथ्यों से स्पष्ट है कि देश के सार्वजनिक क्षेत्र के कोयला उद्योग को किस दिशा में ढ़केला जा रहा है।  

Friday, September 7, 2012

मनमोहन सरकार : न शासन, न प्रशासन

कांग्रेस की अगुआई वाली केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार अब ठहर-सी गई है। वह न तो राजनैतिक फैसले लेने की स्थिति में है और न ही सामान्य प्रशासकीय काम कर पा रही है। यह स्थिति चाहे गठबंधन की मजबूरियों के कारण हो अथवा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बेहद कमजोर होने के कारण, लेकिन इसमें दो मत नहीं कि केंद्र की सरकार हर मोर्चे पर फ्लाप होती जा रही है। मिसाल के तौर पर सरकार के सामान्य प्रशासकीय कार्यों के निष्पादन में विलंब होने से बुनियादी ढांचे का निर्माण अवरूद्ध है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) का गठन भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1988 के तहत किया गया था। यह प्राधिकरण राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास, रख-रखाव तथा प्रबंधन के लिए उत्तरदायी है। ऐसे में देश के महत्वपूर्ण बुनियादी ढ़ांचे का निर्माण में इस प्राधिकरण की भूमिका के महत्व का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। पर सरकार चेयरमैन का पद खाली रखकर इस महत्वपूर्ण प्राधिकरण को कोई दो वर्षों तक पंगु बनाए रही। अनिर्णय के कारण ऐसी स्थिति बनी। तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) आजकल चर्चा में है। किसी उपलब्धि के कारण नहीं, बल्कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की खराब टिप्पणियों के कारण। सीएजी का मानना है कि ओएनजीसी अपने अन्वेषण क्रियाकलाप पर वांछित जोर नहीं दिया। कंपनी के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन होते हुए भी उसने अन्वेषण संबंधी योजनाओं के विस्तार में सुस्ती बरती, जिसके कारण उत्पादन कम होता गया। तेल और प्राकृतिक गैस के मामले में विदेशी निर्भरता कम करने के लिहाज से ओएनजीसी के महत्व को समझा जा सकता है। लेकिन सरकार को शायद ही इसकी चिंता है। तभी तो ओएनजीसी के चेयरमैन का पद लगभग सवा साल से रिक्त है। ऐसे में बिना इंजन की गाड़ी तो ऐसे ही चलेगी ना। देश में पनबिजली निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने वाला सार्वजनिक क्षेत्र का एनएचपीसी लिमिटेड लगभग एक साल से प्रभारी चेयरमैन के भरोसे है। इसका प्रभाव चालू वित्तवर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में देखने को मिला, जब इसका शुद्ध लाभ 15 प्रतिशत घटकर 670 करोड़ रुपये हो गया। एनएचपीसी की स्थापित क्षमता 5,100 मेगावाट से अधिक है। चालू वित्तवर्ष में कंपनी की कुल क्षमता में 1,200 मेगावाट का इजाफा करने का लक्ष्य निर्धारित है और 21,000 मेगावाट से अधिक क्षमता की परियोजनाएं क्रियान्वियन के विभिन्न चरणों में हैं। ऐसे में चेयरमैन की नियुक्ति के मामले में सरकार के अनिर्णय के कारण पनबिजली परियोजनाएं अधर में लटक सकती हैं या फिर अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाएंगे। यूनिट ट्रस्ट आफ इंडिया (यूटीआई) देश का एक महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थान है। सन् 1963 में संसद में पारित एक अध्यादेश के जरिए बने यूटीआई एक्ट के बाद अस्तित्व में आए इस वित्तीय संस्थान के अब तक के इतिहास में पहली बार इसके चेयरमैन का पद पिछले 19 महीनों से खाली है। यह पद श्री यूके सिन्हा को सेबी का चेयरमैन बनाए जाने के कारण रिक्त हुआ था। पर सरकार अब तक इस स्थान को नहीं भर पाई है। इससे यूटीआई का कामकाज प्रभावित है। इसे एक छोटे से उदाहरण से समझा जा सकता है। आयकर विभाग ने लोगों को पैन कार्ड समय पर उपलब्ध कराने के लिए यूटीआई के साथ करार किया था। लेकिन 65 रुपए खर्च करके भी आयकर रिटर्न फाइल करने के इच्छुक लोगों को पैन कार्ड नहीं मिल पा रहा है। फार्म भरने के 15 दिनों के अंदर पैन कार्ड देने का यूटीआई का वादा सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है। यूटीआई अधिकारी खुद मानते हैं कि बड़ी तादाद में आवेदन पत्र आने के कारण 15 दिन की समय सीमा का वादा पूरा नहीं हो पा रहा है। कई अन्य स्वायत्त तथा सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में भी ऐसे उदाहरण भर पड़े हैं। नीतिगत मामलों में गठबंधन की मजबूरी समझी जा सकती है। मसलन, केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले साल 24 नवंबर को खुदरा कारोबार में एफडीआई को मंजूरी दे दी थी। पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुआई वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के विरोध के कारण सरकार इसे अमल में नहीं ला सकी है। इसी तरह सिविल एवियशन के क्षेत्र में भी विदेशी पूंजी निवेश का मामला अटक गया है। पर प्रशासकीय कार्यों का निष्पादन न कर पाना किस मजबूरी का हिस्सा है? सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों एनएचपीसी अथवा ओएनजीसी के चेयरमैन पद के लिए उपयुक्त उम्मीदवारों का चयन करने से क्या किसी ने रोका? सच तो यह है कि यह सरकार अब प्रशासकीय कार्यों के मामलों में अनिर्णय की स्थिति में तो है ही, नीतिगत मामलों में भी खुद ही अंतर्विरोधों से घिरी हुई दिख रही है। इसका नजारा हाल ही देखने को मिला। कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी की प्रतिष्ठा से जुड़े भूमि अधिग्रहण विधेयक को कांग्रेसी मंत्रियों के अंतर्विरोधों के कारण पुनर्विचार के लिए मंत्रिसमूह [जीओएम] के गठन का फैसला सुनाकर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। यह विधेयक दूसरी बार जीओएम को सौंपा गया है। कहते हैं कि कैबिनेट की बैठक में विधेयक पर सरकार के पांच बड़े मंत्रियों शहरी विकास मंत्री कमलनाथ, सड़क परिवहन और राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री सीपी जोशी, वाणिज्य व उद्योग मंत्री आनंद शर्मा, कारपोरेट मामले व ऊर्जा मंत्री वीरप्पा मोइली तथा नागरिक उड्डयन मंत्री रालोद अध्यक्ष अजित सिंह ने सख्त एतराज जताया। यूपीए-2 की सरकार एक तरफ भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों को लेकर बेदम होती दिख रही है। वहीं दूसरी तरफ आर्थिक मोर्चे पर भी उसका प्रदर्शन अच्छा नहीं माना जा सकता। वित्तीय वर्ष 2011-12 में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 4.6 फीसदी से बढ़कर 5.9 फीसदी हो गया। जबकि बजट में सकल घरेलू उत्पाद का आठ फीसदी से ज्यादा विकास की गुलाबी तस्वीर दिखाई गई थी। इन तमाम स्थितियों व परिस्थितियों के बीच कोयला खानों के आवंटन के सवाल पर इस पूरे सत्र में संसद में जिस तरह का नजारा रहा उसको देखते हुए हिंदी के विद्रोही कवि और गजलकार दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां प्रासंगिक लगती हैं, “अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।”

Friday, September 2, 2011

तब पछता कर होगा क्या, जब चिड़िया चुग जाएगी खेत!

गांधीवादी अन्ना हजार के अभियान पर काफी मत-मतान्तर है। प्रमुख राजनीतिक दलों के लोग प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इसके विरोध में हैं। कुछ दल जनांदोलनों के दबाव में अन्ना के पक्ष मे होने का दिखावा कर रहे हैं।

यह गंभीर स्थिति है। मेरा मानना है कि राष्ट्रहित में चल रहे इस अभियान के मामले में मतभिन्नता बनी रही तो देश में संकट गहराता जाएगा। ...और जब हमारी आंखें खुलेंगी, तब तक चिड़िया चुग गई होगी खेत। फिर तो पछता कर भी क्या होगा।

इस संदर्भ में जर्मनी के मार्टन नीमोलर की पंक्तियां याद आती है-

पहले वो आए साम्यवादियों के लिए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं साम्यवादी नहीं था
फिर वो आए मजदूर संघियों के लिए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं मजदूर संघी नहीं था
फिर वो यहूदियों के लिए आए
और मैं चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी नहीं था
फिर वो आए मेरे लिए
और तब तक बोलने के लिए कोई बचा ही नहीं था

Saturday, February 26, 2011

वैचारिक प्रतिबद्धता की वजह से विरोधियों के भी श्रद्धेय रहे सतीश बाबू

किशोर कुमार
समाजसेवी, गांधीवादी चिंतक व पत्रकारिता के युग पुरुष श्री सतीशचंद्र का हमारे बीच से उनका यूं चले जाना बहुत अखर रहा है। मैंने अपना गुरू और अभिभावक दोनों खोया है। अथाह दुख के इन पलों को व्यक्त करने के लिए हमारे पास फिलहाल कोई शब्द नहीं हैं।
सतीश बाबू के निधन से पत्रकारिता के एक युग का अंत हो गया है और इस खालीपन को भरना मुश्किल है। सतीश बाबू ने 1947 में झारखंड की धरती पर कदम रखा था। तब से वह लगातार देश औऱ प्रदेश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे। उन्होंने 'इंडियन नेशन' और 'आर्यावर्त' अखबारों में नौकरी की और धनबाद में 'आवाज' नामक साप्ताहिक अखबार निकाल रहे ब्रह्मदेव सिंह शर्मा के साथ मिलकर उसे दैनिक अखबार का स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने सन् 1982 में 'आवाज' से अलग होकर 'जनमत' नामक दैनिक अखबार निकाला। 50 वर्षों के पत्रकारीय जीवन में उन्होंने देश के शायद ही किसी पत्र-पत्रिका में न लिखा हो।
उनका मजदूर आंदोलन से भी नजदीकी रिश्ता था। कांतिभाई मेहता के साथ काफी काम किया। वर्षों इंटक का मुखपत्र “खान मजदूर” का संपादन किया। उनकी साहित्यिक कृतियों में कोयला मजदूरों की जिंदगी पर अनुसंधानपरक और मार्मिक उपन्यास 'वन पाथर' तथा 'काली माटी' को खूब सराहा गया। इन सभी कृतियों का प्रकाशन जनमत प्रकाशन ने किया था, जिसकी स्थापना खुद सतीश बाबू ने की थी। सतीश बाबू पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। लेकिन कलम से उनका नाता अंत-अंत तक बन रहा। यादाश्त गजब की थी।
सतीश बाबू अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की वजह से अपने विरोधियों के भी श्रद्धेय रहे। कलम के सिपाही सतीश बाबू ने अपना फर्ज निभाते वक़्त कभी कोई समझौता नहीं किया। मुझे एक घटना याद है। धनबाद के धनसार इलाके में अवैध शराब पीने से पांच-छह लोगों की मौत हो गई थी। पत्रकार सतीश कुमार ने इस विषय पर जैसे ही स्टोरी की, आबकारी विभाग के तत्कालीन कमिश्नर को इसकी भनक लग गई। वे अखबार के प्रधानसंपादक सतीश बाबू से मिलकर स्टोरी रूकवाने भागे-भागे जनमत कार्यालय पहुंच गए। पर सतीश बाबू पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने कहा, “यह खबर सही है और प्रकाशित होगी। आप चाहें तो इसका खंडन भेज सकते हैं।“ कमिश्नर को निराश होकर लौटना पड़ा था। ऐसे एक नहीं, अनेक मामले हैं, जिसकी चर्चा हो तो मोटी किताब तैयार हो जाए
पुरानी पीढ़ी के धनबाद के लोग इस बात से वाकिफ हैं कि सतीश बाबू ने अविभाजित बिहार के दक्षिण और उत्तर बिहार को रेल यातायात से जोड़ने की मांग को लेकर इतना असरदार आंदोलन चलाया था कि तब के रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र को मौर्य एक्सप्रेस चलाने की घोषणा करके आंदोलन समाप्त करना पड़ा था। खास बात यह है कि ललित बाबू से सतीश बाबू के व्यक्तिगत संबंध थे और उन्होंने जनहित में इस संबंध को दरकिनार करके आंदोलन का सहारा लिया था।
उन्होंने कहा है कि मीडिया पर किसी भी आक्रमण के विरूद्ध सदैव योद्धा की तरह खड़े रहे। धनबाद ही नहीं, पूरे झारखँड के पत्रकार भूले नहीं हैं कि 1989 में पुलिस प्रशासन द्वारा पत्रकारों पर दमनात्मक कार्रवाइयों के विरूद्ध सतीश बाबू किस मजबूती से खड़े हुए थे। ललित नारायण मिश्रा से दोस्ती के कारण उनके छोटे भाई तथा बिहार के मुख्यमंत्री रहे डा.जगन्नाथ मिश्र उनका बड़ा सम्मान करते थे। वे उन्हें बड़े भाई की तरह ही मानते थे। लेकिन जब मुख्यमंत्री के रूप में डा.मिश्रा ने प्रेस के विरूद्ध विधेयक लाया तो सतीश बाबू इसके विरूंद्ध आवाज बुलंद करने वालों की अगली कतार में थे।
सतीश बाबू ने हमेशा व्यक्तिगत संबंधों को महत्व दिया और सत्ता प्रतिष्ठान के चकाचौंध से दूर ही रहे। एक बार की घटना याद है। पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर धनबाद दौरे पर थे। उन्होंने सतीश बाबू को याद किया और कहा कि वे उनके घर पर आना चाहते हैं। सतीश बाबू ने कहा, “आपका घर है, आइए। पर व्यक्तिगत हैसियत से।“ कर्पूरी ठाकुर ने ऐसा ही किया। वे अकेले ही गाड़ी से आए और सर्किट हाउस के बदले सतीश बाबू के घर में रहना पसंद किया।
सतीश बाबू नारियल के समान थे, ऊपर से कठोर पर भीतर से कोमल और उज्जवल। वे अक्सर बताते कि उन्होंने कैसे संघर्ष करके और बिना किसी औपचारिक शिक्षा के पत्रकारिता और सामाजिक क्षेत्र में अपनी जगह बनाई। इसलिए वे सदैव कर्म को ही पूजा मानते रहे और युवाओं को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित भी करते थे। असहायों की पीड़ा उनसे देखी नहीं जाती थी। जनमत के दिनों में भी गुमशुदे की तलाश जैसे मैटर क्लासिफायड विज्ञापन की श्रेणी में आते थे। अक्सर ऐसा होता था कि कोई गरीब महिला आ जाती और कहती कि उसका आदमी बाहर गया था, लौटकर नहीं आया या बेटा मिल नहीं रहा, अखबार में छपवा दीजिए। वह कर्ज लेकर भी पैसे देने को तैयार रहती। पर सतीश बाबू का दिल पिघल जाता और वे मुफ्त विज्ञापन प्रकाशित करवा देते थे।
गरीब छात्रों की फीस माफ करने के लिए स्कूल-कालेजों के प्राचार्यों को अक्सर चिट्ठियां लिखा करते थे और उन चिट्ठियों का सम्मान भी होता था। स्थिति ऐसी थी कि अनेक लोग आते और कहते कि सर
आपकी कृपा से ही मैं पढ़ पाया और अब फलां जगह काम कर रहा हूं। कोई बीमार हो अथवा लड़की की शादी में मदद की जरूरत हो, वे सदैव तैयार रहते थे। बात ज्यादा पुरानी नहीं है। यशवंत सिन्हा केंद्रीय मंत्री की हैसियत से धनबाद आए थे। उन्हें न्यू टाऊनहाल में चित्रगुप्त महापरिवार के एक कार्यक्रम में भाग लेना था। महापरिवार के कुछ वरीय पदाधिकारियों ने सतीश बाबू से भी उस कार्यक्रम में भाग लेने का अनुरोध किया। पर सतीश बाबू ने एक शर्त्त रख दी। कहा, “यदि उस कार्यक्रम में यह शपथ दिलाई जाएगी कि सभी अपने लड़कों की शादी बिना तिलक-दहेज के करेंगे, तभी वे शिरकत करेंगे।“
वे अखबार के कर्मचारी बैजू को बेहद प्यार करते थे। बैजू ने भी अंत तक उनका साथ नहीं छोड़ा। कुछ महीने पहले ही सतीश बाबू ने मुझे एक जिम्मेदारी सौंपी कि वे रहें न रहें, लेकिन मैं बैजू के बेटे को नौकरी दिलाने में हर संभव मदद जरूर करूंगा। आज सतीश बाबू इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनका यह आदेश सिर मत्थे है। पत्रकारिता के साथ ही सामाजिक क्षेत्र में सतीश बाबू के योगदान को सदा याद किया जाएगा।

Wednesday, July 14, 2010

अनैतिक तरीके से जनता की जेबें खाली कराने के खेल का पटाक्षेप

किशोर कुमार
देश की साधारण बीमा कंपनियों द्वारा खेले गए नाटक की अंतिम परिणति आम जनता की जेबे हल्की कराने के रूप में हुई है। स्वास्थ्य बीमाधारकों से किए गए करार को एक झटके में तोड़कर बड़े शहरों के नामचीन अस्पतालों में इलाज कराने वालों को कैशलेस की सुविधा वापस लेने वाली इन कंपनियों ने चार दिनों तक चले हाई वोल्टेज ड्रामें के बाद इस शर्त्त के साथ कैशलेस सुविधा बहाल करने को तैयार हुई हैं कि अब यह सुविधा प्राप्त करने वालों को पहले से कहीं ज्यादा प्रीमियम देना होगा।

मुंबई में सीआईआई की पहल पर इंश्योरेंस कंपनियों तथा हेल्थकेयर इंडस्ट्री की 12 जुलाई 2010 को हुई बैठक में कैशलेस सुविधा वापस करने की बात तय हुई है। सरकारी इंश्योरेंस कंपनियों जैसे ओरियंटल इंश्योरेंस, न्यू इंडिया इंश्योरेंस नेशनल इंश्योरेंस और यूनाइटेड इंश्योरेंस ने अब कैशलेस सुविधा वाले अस्पतालों की संख्या बढ़ाने का भी फैसला किया है।

अस्पतालों द्वारा बीमाधारक मरीजों के इलाज के बहाने अनैतिक तरीके से अपनी तिजोरी भरने संबंधी एक सही मुद्दे की आड़ में बीमा कंपनियों ने वही किया, जिसका खाका उन्होंने आज से कोई छह महीने पहले तैयार कर लिया था। दरअसल साधारण बीमा कंपनियों ने सरकार के पास एक प्रस्ताव भेजा हुआ, जिसमें स्वास्थ्य बीमाधारकों से लिए जाने वाले मौजूदा प्रीमियम की नीति में बदलाव करके तीन प्रकार से प्रीमियम लेने का प्रस्ताव है।
साधारण बीमा कंपनियों के प्रस्ताव के मुताबिक जो बीमाधारक टीपीए द्वारा बिना सवाल खड़ा किए त्वरित कैशलेस सुविधा चाहेंगे उन्हें कुल अस्पताल खर्च का पच्चीस फीसदी रकम देनी होगी। दूसरी क्षेणी में वे बीमाधारक होंगे, कुल अस्पताल खर्च का दस प्रतिशत चार्ज किया जाएगा। इस श्रेणी के बीमाधारकों को पूरी छानबीन करके कैशलेस की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इस प्रक्रिया में बीमाधारकों को 24 घंटे तक इंतजार करना पड़ सकता है। तीन श्रेणी उन बीमाधारकों की होगी जो बीमा कराते समय केवल प्रीमियम देंगे। अस्पताल खर्च का कुछ भी हिस्सा वहन नहीं करेंगे। ऐसे बीमाधारकों से ज्यादा प्रीमियम लिया जाएगा।
साधारण बीमा कंपनियों ने अभी अंतिम विकल्प की घोषणा की है। लेकिन न्यू इंडिया इंश्योरेंस के सीएमडी एम रामदास ने देश में हेल्थ इंश्योरेंस को सुलभ बनाने के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा कहकर संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में सरकार की हरी झंडी मिलते ही बाकी दो विकल्पों को भी सार्वजनिक कर दिया जाएगा। मेरा मानना है कि अस्पतालों से कुछ समय के लिए कैशलेस सुविधा वापस लिए जाने का खेल सरकार को विश्वास में लेकर किया गया। वरना कोई भी सरकारी कंपनी देश की करोड़ों जनता से जुड़े मामले में जनता को विश्वास में लिए बिना और बीमाधारकों से किए गए करार को बीच में तोड़कर तानाशाह की तरह फैसला नहीं कर सकती थी।
देश के बड़े अस्पतालों और साधारण बीमा कंपनियों के ताजा विवाद से यह संदेश देने की कोशिश की गई कि चूंकि निजी अस्पतालों पर सरकार का नियंत्रण नहीं है और सरकार चाहती है कि कैशलेस की सुविधा जनता को मिलती रहे, इसलिए बीच का रास्ता निकाला जा गया है, जो जनहित में है। जबकि हकीकत यह है कि प्रीमियम बढ़ाने संबंधी प्रस्ताव लंबे समय से तैयार है।
खैर आम जनता को हर आर्थिक मोर्चे पर ठगा जाता है और लूट-खसोट के कारण खाली हुए सरकारी खजाने को भरने के लिए अतार्किक ढ़ंग से करारोपण किया जाता है। अब जनता इसके लिए अभ्यस्त भी हो गई है। लेकिन इस पूरे प्रकरण से सामने आया अहम् सवाल, जो अस्पतालों की अनैतिक लूट से संबंधित है, सामाजिक सरोकारों वाले लोगों के लिए बड़ा मुद्दा है। सरकार से निजी अस्पतालों की मनमानी पर रोक लाने की उम्मीद करना बेकार है। उसके दोनों हाथ में लड्डू है। स्वास्थ्य बीमाधारकों से ज्यादा प्रीमियम मिला या अस्पताल खर्च का एक हिस्सा बीमाधारकों से मिल गया तो ठीक और अपना बिजनेस मार खाने के डर से निजी अस्पताल वाले कैशलेस सुविधा बहाल कराने के लिए लाबिंग करें तो ठीक। निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों के साथ की जा रही ज्यादती पर वह यह कहकर हाथ खड़े कर लेगी कि उन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है।
जब साधारण बीमा कंपनियों ने निजी अस्पतालों की लूट के मामले को मुद्दा बनाया तो सबने देखा भी कि सरकार इस विषय पर चुप रह गई। उसने भूल से भी नहीं कहा कि साधारण बीमा कंपनियों द्वारा उठाया गया मुद्दा गंभीर है और इसकी जांच करवाई जाएगी। ताकि बीमा कंपनियों और मरीजों की अनैक लूट का शिकार नहीं होना पड़े। अब जनता के मन में सवाल हो सकता है कि आर्थिक उदारीकरण के दौर में क्या सरकार के लिए जनता के स्वास्थ्य जैसा बुनियादी मुद्दा गायब है। जनता सोच सकती है कि सरकार निजी अस्पतालों को सस्ती दरों पर महंगी जमीन उपलब्ध कराती है, उपकरणों के आयात कर करों में झूट देती है और ढेर सारी सुविधाएं देती है, जिसमें सरकारी कर्मचारियों को इन निजी अस्पतालों में इलाज कराने की अनुमति प्रमुख है। जनता सोच सकती है कि इन सुविधाओं में से एक भी वापस लिय़ा गया तो निजी अस्पताल वालों के लिए भारी पड़ जाएगा। फिर सरकार जनहित में कोई स्टैंड क्यों नहीं ले पाई?
जनता की इस सोच पर कोई क्या बोले? जनता कुछ भी सोचे, उसने जिन्हें अपने हितों की रक्षा के लिए बोलने का अधिकार दिया हुआ है आर्थिक उदारीकरण के प्रभाव में उनकी भी जुबान तो सिल गई है। फिर विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले इस देश में सरकार के अंग मनमानी कर रहे हैं और जनता की सोच को वाणी नहीं मिल पा रही है तो अचरज की क्या बात है? लेकिन इन तमाम कारकों के बावजूद जनता अपने को छले जाने और ठगे जाने के मुद्दे पर चिंतन भी करने लगे तो निजी अस्पतालों की मनमानी पर रोक या नियंत्रण मजबूरी हो जाएगी। फिर साधारण बीमा कंपनियों के लिए भी प्रीमियम बढ़वाने के लिए भविष्य का एक मुद्दा छिन जाएगा

Tuesday, July 13, 2010

स्वास्थ्य बीमा पर उदारीकरण का साइड इफेक्ट

किशोर कुमार

देश के अनेक शहरों के कोई डेढ़ सौ अस्पतालों में मेडिक्लेम की कैशलेस सुविधा नहीं मिलेंगी। स्वास्थ्य बीमा करने वाली सरकारी और गैर सरकारी साधारण बीमा कंपनियों ने बीमाधारकों को विश्वास में लिए बिना उन्हें दी जाने वाली इस महत्वपूर्ण सुविधा को चुपचाप वापस लेकर सबको सकते में डाल दिया है। संवैधानिक संस्था से निर्देशित होने वाली और जनता के प्रति उत्तरदायी निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के साथ ही सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र की सामान्य बीमा कंपनियां ऐसा गैर जिम्मेदारना और जन विरोधी कदम उठाकर बीमाधारकों के विश्वास को एक झटके में तोड़ देंगी, इसकी किसी को कल्पना तक नहीं थी।
यह सुनने में छोटी बात लग सकती है। लेकिन स्वास्थ्य बीमा कराकर निश्चिंत हो बैठे उन लोगों के नब्ज को टटोलिए जो अचानक संकट में फंसकर अस्पताल पहुंच चुके हैं और अब धन की कमी इलाज में बाधक बन गई है। तब पता चलेगा कि साधारण बीमा कंपनियों का यह छोटा सा कदम लाखों बीमाकृत लोगों के लिए किस स्तर तक परेशानी का सबब बन चुका है। वैसे भी पॉलिसी अवधि में ऐसा फैसला उपभोक्ताओं के अधिकारों का उल्लंघन है।
अस्पताल के मनमाने बिलिंग से परेशान होकर 18 कंपनियों ने स्वास्थ्य बीमा की कैशलेस सुविधा पर रोक लगाए जाने की जानकारी आम लोगों को 10 जुलाई को एक अंग्रेजी अखबार के जरिए मिली। हुआ यूं कि जब बीमाकृत मरीजों के परिजनों ने अपने अपनी बीमा कंपनी द्वारा बहाल टीपीए को कैशलेस सुविधा के लिए अर्जी भेजी, तब जबाव में बताया गया कि यह सुविधा 1 जुलाई 2010 से ही बंद की जा चुकी है। ऐसा एक दो नहीं, बल्कि पांच सौ से ज्यादा मरीजों के साथ हुआ। तब बात फैलकर अखबार तक पहुंची। साधारण बीमा कंपनियों ने उक्त अखबार के पत्रकार द्वारा पूछे जाने पर स्वीकारा कि कैशलेस सुविधा बंद की जा चुकी है। हैरानी इस बात की है कि साधारण बीमा कंपनियों द्वारा जनता खासकर मरीजों से जुड़े इतने बड़े फैसले से आज तक बीमाकृत व्यक्तियों को अवगत नहीं कराया गया है। यहां तक कि बीमा एजेंटों को भी इस फैसले की खबर अखबार से ही मिली है।
अब 150 अस्पतालों में इलाज के लिए मरीजों को अपनी जेब से पैसा देना होगा। हालांकि बाद में इंश्योरेंस कंपनी के पास इलाज पर खर्चे हुए पैसों का क्लेम किया जा सकता है, लेकिन पूरा पैसा मिल जाए इसकी गारंटी नहीं है। दरअसल इस सुविधा को बंद करने के पीछे का कारण यह बताया जा रहा है कि कैशलेस सुविधा के कारण अस्पतालों द्वारा मनमानी दर पर बिल वसूले जाने के कारण बीमा कंपनियों को सालाना तीन सौ करोड़ रूपए का घाटा हो रहा है। इन कंपनियों को प्रीमियम से 6000 करोड़ रूपए आता है और अस्पतालों के क्लेम पर कोई 7500 सौ करोड़ हो जाता है। यानी सालाना 1500 करोड़ रूपए का घाटा। इस घाटे में दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अस्पतालों की बड़ी भूमिका होती है।
यह सच है कि सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मध्य वर्ग भी निजी अस्पतालों की ओर रूख किए हुए हैं। इसका बेजा लाभ महानगरों के वैसे अस्पताल उठा रहे हैं, जो एक निश्चित संख्या में गरीब मरीजों का इलाज करने का आश्वासन देकर सस्ती दरों पर जमीन और करों का लाभ जैसी अनेक सरकारी सुविधाएं लिए हुए हैं। चिकित्सकों की छवि आम जनता में आज भी भगवान जैसा ही है। पर अस्पताल प्रबंधकों की नजर में ये चिकित्सक मार्केटिंग के अधिकारी पहले हैं। उन्हें लक्ष्य दिया हुआ है कि हर तिमाही उन्हें कितना बिजनेस देना है। दूसरे शब्दों में मरीजों से कितना धन उगाहना है। इसके एवज में इन पृथ्वी के इन “भगवानों” को मोटी तनख्वाह मिलती है। ऐसे में चिकित्सकों की नजर में मरीजों की स्थिति एक क्लाइंट से ज्यादा क्या हो सकती है। मरीजों के अस्पताल पहुंचते ही बात का बतंगड़ बनाकर डराने और फिर अनावश्यक जांचों का सिलसिला शुरू हो जाता है। लंबे समय तक अस्पताल में रखकर बेड चार्ज से लेकर फीस तक के बहाने मोटी रकम वसूली जाती है।
साधारण बीमा कंपनियों का यह कहना सही है कि महानगरों में ओपन हार्ट सर्जरी पर जहां डेढ़ से पौने दो लाख रूपए तक खर्च होने चाहिए। वहीं अस्पतालों द्वारा कम से कम ढ़ाई लाख रूपए का बिल बनाया जाता है। इसी तरह प्रसव पर अधिकतम बीस हजार रूपए का बिल होना चाहिए। पर बिल बनाया जाता है चालीस हजार रूपए से भी ज्यादा का। एक राष्ट्रीय दैनिक के एसोसिएट एडीटर के बेटे को बुखार हुआ था। तब चिकनगुनिया का शोर था। संपादक महोदय घबरा कर दिल्ली के एक निजी अस्पताल में जैसे ही गए अंतहीन जांच का सिलसिला शुरू हुआ और तीन दिनों में 67 हजार रूपए का बिल बन गया। फिर भी बात नहीं बनी तो राम मनोहर लोहिया अस्पताल गए। वहां चिकित्सक पारासिटामोल देकर सब कुछ सामान्य कर दिया।
जो लोग भी निजी अस्तालों की हकीकत जानते हैं उन्हें बीमा कंपनियों की शिकायतों से मतभेद नहीं हो सकता। लेकिन निजी अस्पतालों का यह प्रैक्टिस कोई आज से तो शुरू हुआ नहीं है। तभी तो जैसा कि बीमा कंपनियों का दावा है कि वे कई वर्षों से घाटे में हैं। लेकिन यहां सवाल यह है कि बीमाकृत व्यक्तियों को कोई सुविधा बताकर अपने प्रोडक्ट बेचने वाली कंपनियों को उस सुविधा से वंचित कर दिया जाना कितना सही है? भारत में स्वास्थ्य बीमा की मौजूदा विकास दर 9.3 प्रतिशत है। भारतीय विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) द्वारा जारी हैंडबुक ऑन इंडियन इंश्योरेंस स्टैटिस्टिक्स के मुताबिक स्वास्थ्य बीमा के मामले में साधारण बीमा कंपनियों को भले घाटा हो रहा है। लेकिन उसके अन्य उत्पादों यथा वाहन बीमा, अग्नि बीमा आदि में काफी फायदा है। यही वजह है कि ये बीमा कंपनियां स्वास्थ्य बीमा में घाटे के बावजदू कुल मिलाकर फायदे में हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक दावों का भुगतान करने में सार्वजनिक क्षेत्र की साधारण बीमा कंपनियों पर बोझ निजी बीमा कंपनियों के मुकाबले कहीं ज्यादा है। यही नहीं, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का क्लेम सेटलमेंट रिकॉर्ड भी ज्यादा बेहतर है। आईआरडीए की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक सरकारी साधारण बीमा कंपनियों की शुद्ध प्रीमियम आय का 80 फीसदी से अधिक हिस्सा दावों का भुगतान में चला जाता है। जबकि निजी कंपनियां अपनी प्रीमियम आय का सिर्फ 50 फीसदी ही दावों के भुगतान में खर्च पाती हैं। जाहिर है कि कोई एक उत्पाद घाटे का सौदा होने के बावजूद इन कंपनियों के लिए खतरे की कोई बात नहीं है।

यह सही है कि उदारीकरण के इस दौर में सामाजिक सरोकारों की बात काफी पीछे चली गई है। इस पर बहस की पूरी गुंजाइश है और होनी भी चाहिए। कांग्रेस जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी का नाम लेकर वोट मांगती है और उनकी नीतियों का बखान करके जनता का वास्तविक हमदर्द होने का दावा करती है। लेकिन व्यवहार रूप में उन नेताओं के सामाजिक सरोकारों वाली नीतियों को बिल्कुल भूल गई है। वरना साधारण बीमा कंपनियों ने जैसे ही बीमाकृत व्यक्तियों के साथ वादाखिलाफी की, वह तुरंत इसके विरोध में सामने आ सकती थी। वह अपनी सरकार पर दबाव बना सकती थी कि एक उत्पाद के घाटे में होने के बावजूद साधारण बीमा कंपनियां मुनाफे में हैं, इसलिए फिलहाल जनता को मिलने वाली कैशलेस सुविधा को जारी रखा जाना चाहिए। सरकार को भी साधारण बीमा कंपनियों की शिकायतों के निबटारे के लिए उपाय निकालना चाहिए था। ताकि उपभोक्ता अधिकारों का हनन नहीं हो। पर आर्थिक उदारीकरण के ध्वजवाहक सरकार की सारी चिंता अपनी अर्थ-व्यवस्था को विदेशियों के लिए खोलने और सामाजिक सरोकारों वाले कामों से अपना पल्ला झाड़ने तक सीमित रह गया है।
सरकार न तो बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान दे रही है और न ही मुक्त हस्त से सुविधाएं मुहैय्या कराने के एवज में निजी अस्पतालों पर मरीजों की तिजोरी खाली कराने की कवायद को रोकने के लिए दबाव बना पा रही है। इधर साधारण बीमा कंपनियां व्यापार के सामान्य धर्म का भी निर्हन नहीं कर पा रही हैं। उन्हें जनता के दर्द में भागीदार नहीं होना है तो व्यापार के लिहाज से ही अपने घाटे पाटने के लिए वैकल्पिक इंतजाम कर सकती है। वह अपने नए ग्राहकों के लिए प्रीमियम की दर बढ़ा सकती है या सरकार पर दबाव बना सकती है कि सीजीएचएस वाली दरें साधारण बीमा कंपनियों के लिए भी लागू करवाई जाए।

यदि कुछ मरीज भी अपने फायदे के लिए अस्पतालों के गुनाहों में शामिल हैं तो साधारण बीमा कंपनियां कह सकती हैं कि जो बीमाकृत व्यक्ति एक निश्चित मात्रा में अपना अंशदान देने को तैयार होंगे, उन्हें आसानी से कैशलेस सुविधा दी जाएगी। ऐसा होने से संकट की घड़ी में बीमाकृत मरीजों को तात्कालिक तौर पर धन की कमी तो इलाज में आड़े नहीं आएगी। वैसे सबसे अच्छी नीति तो यह होगी कि सरकार स्वास्थ्य बीमा कराने वालों के लिए भी अस्पतालों से वैसा ही समझौता कराए जैसा सीजीएचएस कार्डधारकों के लिए है। सीजीएचएस कार्डधारकों के लिए अगल-अलग बीमारियों और जांचों के लिए दरें तय हैं। जो अस्पताल सीजीएचएस से संबद्ध हैं, वे सरकार द्वारा निर्धारित दरों पर ही इलाज करते हैं। पर इतना कौन सोचे। उपभोक्ता अधिकारों का हनन होता है तो हो। अंधेरगर्दी जो है। लगता है कि सरकार के जन विरोधी उदारीकरण का दंश भोगते रहना जनता की नियति बन गई है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार तथा सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं)

Tuesday, October 6, 2009

पुलिस ही नहीं, पत्रकारों की भूमिका पर भी बहस हो


किशोर कुमार
पश्चिम बंगाल के लालगढ़ से नक्सली नेता छत्रधर महतो की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की भूमिका और पत्रकारिता की चुनौतियों पर बहस छिड़ी हुई है। यह लाजमी भी है। लेकिन मेरा मानना है कि इस प्रकरण में या ऐसे संवेदनशील मामलों में पुलिस से ज्यादा पत्रकारों की भूमिका पर बहस होनी चाहिए। यह आत्म-मंथन का वक्त है। मैं अपनी बात को विस्तार देने से पहले एक घटना का जिक्र करना चाहूंगा।
बात पुरानी है। तब मैं नवभारत टाइम्स के पटना संस्करण का धनबाद में संवाददाता था। धनबाद जिले के ही टुंडी और पीरटांड इलाके में नक्सलियों की गतिविधियां बढ़ी हुई थीं। उस समय नक्सलियों के एक बड़े नेता पत्रकारों के संपर्क में रहते थे और अपना तथा अपने आंदोलन के हितों की हिफाजत करते हुए पत्रकारों को वांछित सूचनाएं उनके दफ्तरों में जाकर उपलब्ध कराया करते थे।
उक्त नक्सली नेता इस बात के लिए निश्चिंत रहते थे कि पत्रकारों से मिलते-जुलते उनके साथ धोखा नहीं हो सकता। पत्रकार भी इस विश्वास को सदा बनाए रहे। जबकि पुलिस अधिकारी अक्सर अनेक पत्रकारों से उक्त नक्सली नेता को गिरफ्तार करवाने में मदद मांगते रहते थे। कई पुलिस अधिकारी तो कुछ पत्रकारों से अपने निजी संबंधों की दुहाई देकर भी सहयोग मांगते रहते थे। लेकिन उन्हें हमेशा निराशा ही हाथ लगी।
एक बार की बात है कि दिल्ली और पटना के कुछ पत्रकार धनबाद पहुंचे नक्सलवाद पर स्टोरी करने। वे उक्त नक्सली नेता का इंटरव्यू भी करना चाहते थे। चूंकि मैंने कुछ समय पहले ही उक्त नेता का इंटरव्यू किया था, इसलिए स्वाभाविक रूप से उन पत्रकारों ने मुझसे आग्रह किया कि मैं उक्त नक्सली नेता का इंटरव्यू करवा दूं।
मेरे सामने बड़ी दुविधा थी। कारण यह था कि मैं दिल्ली से आए पत्रकारों में सभी को नहीं जानता-पहचानता था। मैंने अपनी इस दुविधा से टाइम्स आफ इंडिया के संवाददाता उमेश सिन्हा ( अब वह इस दुनिया में नहीं रहे ) को अवगत कराया तो उन्होंने सलाह दी कि मैं इन स्थितियों से नक्सली नेता को अवगत करा दूं। यदि उनकी इच्छा हो तभी बाहर से आए पत्रकारों को इंटरव्यू करवाने ले जाऊं।
इंटरव्यू के सवाल पर मंथन चल ही रहा था कि उक्त नक्सली नेता नवभारत टाइम्स के दफ्तर में आ गए। उन्होंने इस बार अपना हुलिया बदल रखा था। मैंने उन्हें पूरी बात बताई तो उन्होंने इतना ही कहा – रहने दीजिए और वे तुरंत ही चले गए। इस तरह बाहर से आए पत्रकारों की इच्छा पूरी नहीं कर पाने की मजबूरी हो गई। हालांकि ऐसा नहीं था कि नक्सलियों की गतिविधियां जो हमें गलत लगती थीं उन पर हम टिप्पणी करते थे। पर नक्सली नेताओं से जाने-अंजाने विश्वासघात किसी ने नहीं किया।
मेरा तात्पर्य यह है कि बहस केवल इस बात को लेकर नहीं होनी चाहिए कि पुलिस ने लालगढ़ में सही किया या गलत। बहस इस बात को लेकर भी होनी चाहिए कि लालगढ़ की घटना के परिप्रेक्ष्य में पत्रकारिता के पवित्र पेशे को अक्षुण बनाए रखने के लिए क्या कुछ किया जाना चाहिए। अनेक लोगों की तरह मैं भी यह नहीं मानता कि लालगढ़ में संबंधित पत्रकार ने छत्रधर महतो के साथ विश्वासघात किया। लेकिन अनजाने में ऐसा हो गया तो उसकी एकमात्र वजह गैरजिम्मेदार कंधे पर पत्रकारिता की बड़ी जिम्मेदारी का होना नहीं तो और क्या है?
यदि अखबारों और चैनलों के कर्त्ताधर्त्ता अपने खास एजेंडे के तहत अथवा मुफ्त में काम निकालने की अपनी नीति के तहत गैरजिम्मेदार कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी देते रहेंगे और ऐसे गैरजिम्मेदार लोग चंद स्वार्थों के लिए इस्तेमाल होते रहेंगे तो पत्रकारों पर कौन भरोसा करेगा? इसलिए लालगढ़ का मामला कोई मामली घटना नहीं है। यह पूरी पत्रकारिता की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ मामला है।
इस परिप्रेक्ष्य में कुछ पत्रकारों के दर्द के समझा जा सकता है, जो पुलिस द्वारा पत्रकार बनकर नक्सली नेता की गिरफ्तारी के विरोध में हैं। लेकिन पत्रकारिता की विश्वसनीयता के मुद्दे पर अपने गिरेबां में भी झांकना जरूरी है। जैसा कि वरिष्ठ टीवी पत्रकार अनुरंजन झा ने अपने ब्लॉग “आर्यावर्त” में इशारा भी किया है और तब यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि मीडिया घराने लालगढ़ के इस मामले में चुप क्यों हैं।
(भड़ास4मीडिया से साभार)

Tuesday, September 29, 2009

प्रभाष जोशी प्रकरण : अहसानमंद हैं गाली नहीं दें।

उमा
नहीं मालूम यह कौन सी हवा चली कि लोग अपने दौरों में कीर्तिमान स्थापित करनेवालों को गाली देकर अपनी कालर ऊंची कर रहे हैं। क्रिकेट या टेनिस से मेरी दिलचस्पी मैदान में भारत या भारतीय की मौजदूगी रहने तक सीमित है। लेकिन प्रभाष जी ने खेल पत्रकारिता को जो कलेवर, मिजाज और तेवर दिए वह किसी खेल पत्रकार के बूते की बात नहीं। विषय कोई भी हो, वो अपनी कंटेंट को जिस तरह खोलते हैं, जैसा रिदम पैदा करते हैं विषय की जटिलता या प्रसंग से वाकफियत की कोई जरूरत नहीं होती। आखिर हिंदी का कौन पत्रकार इसे मानने को तौयार नहीं। उन्होंने एक अखबार से/में जो कुछ किया वह हिंदी पत्रकारिता का मानक हुआ। परिदृश्य में उनकी मौजूदगी प्रसंग को अर्थवान बना देती थी।

दुर्भाग्य ही है कि हिंदी पट्टी की नई बिरादरी जो अभी-अभी मीडिया में प्रवेश ही कर रही है, उसे इन चीजों को देखना-सुनना, परखना-गुनना, सीखना-समझना चाहिए। आखिर जिस साक्षात्कार को लेकर लोग वितंडा खडा कर रहे हैं, क्या उसे समग्रता से, विषय को समूचेपन में उन्होंने देखा है। उन्होंने ब्राह्मण की, ब्राह्मणत्व की चर्चा जरूर की, पर कहीं भी उसे स्थापित करने के लिए तर्क नहीं गढ़े। आखिर सदियों का अभ्यास शारीरिक संरचना, व्यवहार, कौशल व उसके बाद संस्कार को कैसे अप्रभावित रहने देंगे।

यह ठीक है कि उन्होंने किसी के चुनाव प्रचार में सभा को संबोधित कर दिया। आखिर कोई तो बता दे कि इस दुनिया की किसी भी सभ्यता का नायक सभी मायने में आदर्श रहा। मेरा तो मानना है कि सभी नायक लात की पैदाइश थे। यदि उनकी सीमाएं लोगों को स्वीकार्य हैं तो प्रभाष जी तो वह मूर्ति नहीं बने। आखिर उनके दाय को देखते हुए, इन चीजों पर स्वस्थ चर्चा संभव नहीं थी। हमें जिनका कर्जदार होना चाहिए, हम उन्हें गरियाकर कालर ऊंची करके खुश हो लेते हैं।

यह सब मैं इसलिए नहीं लिख रहा कि मुझे उनकी कृपा प्राप्त है, या कृपा की अपेक्षा है। मैंने 14 सालों तक कस्बे में पत्रकारिता की है। और बड़े अखबारों में प्रभावी पदों पर रहने का मौका मिला। चीजों को विकृत होते हुए, विकृति के कारणों को खुली आंखों देखा। अखबार नहीं आंदोलन का नारा बुलंद करनेवाले अखबार में समन्वयक व फीचर प्रभारी का पद इसलिए छोड़ दिया कि प्रबंधन अपनी दिलचस्पी के अनुसार चीजों को चलाने की छूट पा गया था। आज खूब खूशी-खुशी मीडिया से विदा होकर सामाजिक कार्य के क्षेत्र में हूं।

Thursday, September 10, 2009

बालिका वधू : मीडिया में ऐसे बातों को तोड़ा-मरोड़ा गया

लोकसभा की कार्यवाही के दौरान केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी सांसदों के सवालों के जबाव दे रही थीं। शरद यादव की बारी आई तो वह बोलने के लिए खड़े हुए। वह समाचार चैनलों के साथ ही कुछ मनोरंजन वाले चैनलों पर दिखाए जा रहे अनेक कार्यक्रमों से खफा थे। कहने लगे – जब टीवी खोलो, किसी चैनल पर जादू-टोने का कार्यक्रम चल रहा होगा तो किसी चैनल पर सामाजिक विसंगतियों को बढ़ावा देने वाला कार्यक्रम।
मैडम स्पीकर ने हस्तक्षेप करते हुए कहा – आखिर आपका सवाल क्या है? सवाल कीजिए। शरद यादव ने कहा – बालिका बधू जैसे कार्यक्रमों पर पाबंदी लगेगी या नहीं? अंबिका सोनी ने कहा कि चैनलों पर चल रहे कार्यक्रमों की मानिटरिंग के लिए जो व्यवस्था है, उसके तहत इस पूरे मामले को दिखवाएंगी और आवश्यक कार्रवाई भी करेंगी।
इस मामले को खबरिया चैनलों ने हाथों-हाथ लिया। अनेक चैनलों पर खबर चलने लगी कि बालिका वधू को लेकर लोकसभा में हंगामा। शरद यादव ने बालिका वधू को बाल विवाह को बढ़ावा देने वाला बताते हुए इसके प्रसारण पर रोक लगाने की मांग की। मंत्री ने जांच का भरोसा दिया।
लेकिन किसी भी चैनल ने शरद यादव की बातों को समग्रता में नहीं लिया। जादू-टोने वाले कार्यक्रमों को दिखाए जाने के मामले को पूरी तरह नजरंदाज कर दिया। शरद यादव की पीड़ा केवल बालिका वधू को लेकर नहीं थी। वह तो अंधविश्वास और सामाजिक विसंगतियां फैलाने वाले तमाम कार्यक्रमों पर रोक की बात कर रहे थे।
एक पत्रकार ने ठीक ही कहा – बालिका वधू के मामले को उछाल कर बाकी बहुत से मुद्दों पर से ध्यान बांट दिया गया। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो शायद किसी कार्यक्रम विशेष का नहीं, बल्कि अनेक चैनलों का अहित होता। ऐसा भला कौन चाहेगा?

Wednesday, July 15, 2009

लोकसभा में झरिया की कोयला खानों में आग का मामला और अखबारों में न्यूज नदारत

झारखंड मे राष्ट्रपतिशासन की अवधि छह महीनों के लिए बढ़ाए जाने के प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा के दौरान बार-बार झरिया की कोयला खानों में लगी भूमिगत आग और उससे उत्पन्न खतरे की बात आई। लेकिन झारखंड के किसी भी प्रमुख अखबार में यह खबर नहीं है।
अलबत्ता यह खबर जरूर है कि झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री तथा जमशेदपुर के सांसद अर्जुन मुंडा ने राष्ट्रपतिशासन की अवधि बढ़ाए जाने के सवाल पर कितना अच्छ भाषण दिया। हालांकि उसके साथ ही यह खबर भी नहीं है कि श्री मुंडा की बातों की कांग्रेस के जगदंबिका पाल ने किस तरह धज्जियां उड़ाई और मुंडा की बातों के जबाव में ऐसे-ऐसे सवाल व तथ्य प्रस्तुत किए कि राजग की बोलती बंद हो गई।
पता नहीं क्यों, झारखंड के अखबार वाले लोकसभा की कार्यवाही तब भी नहीं देखते जब पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक उनके राज्य की चर्चा हो रही होती है। टेलीफोन पर किसी सांसद ने बता दिया कि उन्होंने लोकसभा में या दिल्ली में क्या कहा और क्या किया, ज्यादातर अखबार वाले उन्हीं बातों को ले उड़ते हैं ऐसे जैसे उन्होंने कोई तीर मार ली हो और अखबार की सुर्खियां बन जाती हैं। उन बातों में तथ्य हो अथवा नहीं।

Friday, October 31, 2008

ऐसे में रोजगार की इस मह्त्वाकांक्षी योजना को फ्लाप तो होना ही था

देश की भ्रष्ट एवं अदूरदर्शी नौकरशाही औऱ विकास का एजेंडा पीछे छोड़ चुके राजनीति दलों के कारण महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) फ्लाप कर गई। एक तरफ जिन उद्देश्यों से इस योजना का श्रीगणेश किया गया था, वे पूरे नहीं हो सके। वहीं दूसरी ओर पग-पग पर व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण सरकारी धन का बंदरबांट हुआ। नतीजतन कागजी तौर पर भले ३.०२ करोड़ परिवारों को रोजगार मुहैय्या कराने का दावा किया गया है। पर हकीकत इसके उलट है। मिसाल के तौर पर झारखँड में कुल १ ३९७३८ योजनाएं ली गई थीं। पर उनमें से ३८६२७ योजनाएं ही पूरी की जा सकी हैं। जो योजनाएं पूरी हैं, उनमें से अनेक में घोटालों की कहानियां भरी पड़ी हैं। सामाजिक अंकेक्षण से इसका खुलासा हो चुका है।
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने इस योजना में हो रही गड़बड़ियों की बात स्वीकारते हुए कहा था कि अब मंत्रालय इस पर पूरी नजर रखेगा। इस बात की कोशिश की जाएगी कि वित्त वर्ष 2008-09 में यह पूरी तरह से समस्याओं से मुक्त हो जाए। 'हम इस बात से सहमत हैं कि परियोजना को लागू करने में ढेर सारी समस्याएं हैं। ये समस्याएं सामान्यतया स्थानीय स्तर पर आती हैं। इन समस्याओं को दूर करने के लिए हम आवश्यक कदम उठाएंगे, जिससे इसके उद्देश्यों को पूरा किया जा सके।' लेकिन मंत्री महोदय का यह वायदा अब तक महज कागजी ही साबित हुआ है।
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (नरेगा) का उद्देश्य साल में 100 दिन का रोज़गार उपलब्ध कराकर गैर कृषि अवधि के दौरान अकुशल ग्रामीणों का गाँवों से पलायन रोकना है। इसके माध्यम से जल संरक्षण, भूमि विकस और सूखे की स्थिति का सामना किया जाना है। प्रधानमंत्री डॉ। मनमोहन सिंह ने इस कार्यक्रम को 2 फरवरी, 2006 को प्रारंभ किया था।
सरकारी दिशा-निर्देशों के मुताबिक ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के लागू होने से पूर्व ही परिवारों का पंजीकरण, जॉब कार्ड तथा कराये जाने वाले कार्यों की रूप रेखा तैयार कर लिया जाना था, जिससे कि योजना के क्रियान्वयन में अनावश्यक विलंब न हो। साथ ही इस योजना के प्रभावी क्रियान्वयन से ग्रामीण क्षेत्रें से होने वाले पलायन, विकास कार्यों की मॉनिटरिंग तथा प्राथमिकता का निर्धारण बेहतर ढंग से किया जा सके। इस योजना का यदि सफलतापूर्वक संचालन किया गया होता तो आज देश की तसवीर बदलती हुई दिखती।
लेकिन भ्रष्ट और अदूरदर्शी नौकरशाही ने इस मह्त्वाकांक्षी योजना पर पानी फेर दिया है। जाहिर है कि इसके लिए संबंधित राज्यों के राजनीतिज्ञ भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। लेकिन इस योजना की जितनी उपलब्धियां हैं, उन्हें भुनाने के लिए सारे राजनीतिक दलों में होड़ मची है। उन्हें कौन समझाए कि श्रेय लेने की यह होड़ उनके खिलाफ जा सकती है। उन्हें श्रेय तो तब मिलता जब उनके कार्यकर्ता गांवों में निकले होते, लोगों के जॉब कार्ड बनवाए होते और उन्हें काम दिलाते तथा उनकी न्यूनतम मजदूरी के लिए संघर्ष किए होते।
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना भौतिक उपलब्धियों के मामले में किस तरह विफल हुई, इसकी चर्चा की जा चुकी है। यहां भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक [सीएजी] की उस रिपोर्ट की चर्चा की जा रही है, जिससे इस योजना में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया गया है। सीएजी ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना [नरेगा] में मस्टर रोल में गड़बड़ी, मजदूरों को पूरा मेहनताना न मिलने, बेरोजगारी भत्ता न मिलने, फंड का पूरा इस्तेमाल न होने, समय पर फंड न रिलीज होने, कामकाज की निगरानी न किए जाने आदि के अनेक मामलों का पता लगाया है।
सीएजी ने संसद में पेश वर्ष 2007 मार्च की रिपोर्ट में इन खामियों और गड़बड़ियों का खुलासा किया है। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार गत वर्ष मार्च तक नरेगा के फंड के केवल 73 प्रतिशत हिस्से का ही इस्तेमाल हो पाया यानि करीब 3.5 हजार करोड़ रुपये की राशि खर्च ही नहीं हो पाई।
रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2007 तक केंद्र और राज्य सरकार द्वारा नरेगा के लिए बारह हजार चौहत्तर करोड़ रुपये की राशि मुहैया कराई गई पर जिसमें से केवल 8823 करोड़ रुपये की राशि ही खर्च हो पाई। रिपोर्ट के अनुसार सैंपल सर्वेक्षण से पता चला है कि 18 राज्यों की 269 ग्राम पंचायतों में मस्टर रोल में मजदूरों की पहचान संख्या ही नहीं थी। बारह राज्यों की 134 ग्राम पंचायतों में मस्टर रोल में मजदूरों के नाम, उनकी उपस्थिति- अनुपस्थिति की तथा मेहनताना की जानकारी आदि नहीं थी। 15 राज्यों की 246 ग्राम पंचायतों में मस्टर रोल की कापी सार्वजनिक रूप से जांच के लिए उपलब्ध नहीं थी।
रिपोर्ट के अनुसार 19 राज्यों में नरेगा की राज्य स्तरीय निगरानी ही नहीं हुई या उसे दर्ज ही नहीं किया गया। इन राज्यों के 43 जिलों में जिला स्तर पर केवल दस प्रतिशत ही निगरानी हुई। 22 राज्यों के 105 जिलों में सौ प्रतिशत निगरानी नहीं हुई। रिपोर्ट के अनुसार 20 राज्यों की 354 ग्राम पंचायतों में तो आडिट के लिए छह महीने में ग्राम सभाओं की एक बार भी बैठक भी नहीं हुई। 21 राज्यों की 376 ग्राम पंचायतों में तो नरेगा से संबंधित दस्तावेज, जानकारी और आंकड़े सार्वज्निक रूप से नहीं उपलब्ध कराए गए।
रिपोर्ट के अनुसार 21 राज्यों की 282 ग्राम पंचायतों में काम के लिए मजदूरों ने जो आवेदन दिए, उसकी पावती उन्हें नहीं दी गई, 19 राज्यों की 329 ग्राम पंचायतों में रोजगार रजिस्टर ही नहीं थे। 17 राज्यों के 58 प्रखंडों में मजदूरों को बेरोजगारी भत्ता ही नहीं मिला। रिपोर्ट के अनुसार 12 राज्यों की 79 ग्राम पंचायतों में सात घंटे काम करने के बाद मजदूरों को कम घंटों का मेहनताना दिया गया। 17 राज्यों की 213 ग्राम पंचायतों को समय पर मेहनताना नहीं दिया गया और न ही कोई मुआवजा दिया गया।
स्थानीय स्तर पर तो इस योजना में बड़े-बड़े घपले उजागर हुए हैं। यदि घपलों की बात छोड़ दें तो इसमें कोई शक नहीं कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना लोकलुभावन है। तभी रोजगार गारंटी अधिनियम को पास कराने के सवाल पर संसद में सभी दलों की आमराय बनी थी। यदि यह योजना ईमानदारी से जमीन पर उतारी गई होती तो वास्तविक अर्थों मे ग्रामीणों को सौ दिन रोजगार देने का सपना साकार हुआ होता और देश का विकास भी होता। लेकिन विगत वर्षो में इस योजना को जिस तरह क्रियान्वित किया गया, उसने साबित होता है कि केंद्र के साथ ही राज्य सरकारों और प्रशासनिक तंत्र की उदासीनता के चलते इसकी आत्मा को ही खत्म करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है।
वरना ऐसी कौन-सी वजह थी कि स्पष्ट दिशा-निर्देश और धन की पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद इस योजना के लिए अलग से कर्मचारियों की बहाली नहीं की गई? रोजगार गारंटी कानून के मुताबिक इस योजना को सफल बनाने के लिए प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक कर्मचारी को बहाल किया जाना था, जिसका पदनाम ग्राम रोजगार सेवक होता। पर इस पद को खाली छोड़ दिया जाना इस बात का परिचायक है कि रोजगार गारंटी को लागू करने में राजनीतिक इच्छाशक्ति का घोर अभाव है।
चुनाव की आहट के साथ ही सभी राजनीतिक पार्टियां मुद्दे तलाशने में जुटी हुईं हैं। लेकिन रोजगार गारंटी से जुड़े इस अहम मुद्दे को विपक्षी दल भी ईमानदारी से उठाने के मूड में नहीं दिखतें। यह चिंता की बात है। रही बात मीडिया की तो ज्यादातर मीडिया ने बाजारवाद के चक्कर में ग्रामीण विकास के मुद्दों को लगभग छोड़ ही दिया है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए ऐसे मुद्दे महत्वपूर्ण इसलिए नहीं होते क्योंकि उनसे टीआरपी का कोई संबंध नहीं होता है।
हाल ही योजना आगोग की एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी, जिसमें तथ्यों के आधार पर इस बात का खुलासा किया गया था कि देश के लगभग अस्सी फीसदी लोगों की रोज की आमदनी बीस रूपए से ज्यादा नहीं होती है। ऐसे में ग्रामीण भारत के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना आशा की किरण थी। लेकिन यह आशा निराशा में बदल जाने के बाद रोजगार के घटते अवसर और आसमान छूती महंगाई के बीच आम आदमी तो मरेगा ही। लेकिन यह बात राजनीतिज्ञों से लेकर मीडिया तक के एजेंडे में नहीं है तो भूख से तड़पते आम आदमी के लिए आखिर क्या रास्ता बच जाता है?